मुहर्रम के अवसर पर गिरिडीह वासियों ने ताजिया और जुलुस निकल कर इमाम हुसैन की सहादत को यद् किये |

रिपोर्ट : नफीस अजहर (गिरिडीह)
मुहर्रम के अवसर पर गिरिडीह वासियों ने ताजिया और जुलुस निकल कर इमाम हुसैन की सहादत को यद् किये |
गिरिडीह:इस्लामिक नए साल की दस तारीख को नवासा-ए-रसूल इमाम हुसैन अपने 72 साथियों और परिवार के साथ मजहब-ए-इस्लाम को बचाने, हक और इंसाफ कोे जिंदा रखने के लिए शहीद हो गए थे।इमाम हुसैन के शहादत की याद में गिरिडीह में भी मोहर्रम मनाया गया।इस दौरान या अली या हुसैन के नारों से पूरा इलाका गूंज उठा।जिले भर में मुहर्रम पर ताजिया निकाला गया गया और जगह जगह घूम कर गमजदगी का एहतराम किया गया।मौके पर जुलुस की शक्ल में अखाड़ा खेल का प्रदर्शन भी किया गया।शहरी क्षेत्र के बरवाडीह,भण्डारीडीह पचम्बा आदि क्षेत्रों में सुबह से लेकर शाम तक कई तरह की गतिविधियां संचालित की गई।इस क्रम में सभी इमामबाड़ों में नजरोनियाँज व दुआ की गई।साथ ही कर्बला में फातेहा की गई।मुहर्रम को लेकर जिले भर में सुरक्षा बंदोबस्ती चाक चौबंद रही।जगह जगह मजिस्ट्रेट के साथ सुरक्षा बल तैनात किए गए थे।वही जुलुस की वजह से यातायात बाधित न हो इसका भी ध्यान रखा गया था।बताया गया कि हजरत इमाम हुसैन को उस वक्त के मुस्लिम शासक यजीद के सैनिकों ने इराक के कर्बला में घेरकर शहीद कर दिया था। लिहाजा, 10 मोहर्रम को पैगंबर-ए-इस्लाम के नवासे हजरत इमाम हुसैन की शहादत की याद ताजा हो जाती है। दरअसल, कर्बला की जंग में हजरत इमाम हुसैन की शहादत हर धर्म के लोगों के लिए मिसाल है। यह जंग बताती है कि जुल्म के आगे कभी नहीं झुकना चाहिए, चाहे इसके लिए सिर ही क्यों न कट जाए, लेकिन सच्चाई के लिए बड़े से बड़े जालिम शासक के सामने भी खड़ा हो जाना चाहिए।हक की आवाज बुलंद करने के लिए शहीद हुए थे। बताया गया कि कर्बला के इतिहास को पढ़ने के बाद मालूम होता है कि यह महीना कुर्बानी, गमखारी और भाईचारगी का महीना है, क्योंकि हजरत इमाम हुसैन ने अपनी कुर्बानी देकर पुरी इंसानियत को यह पैगाम दिया है कि अपने हक को माफ करने वाले बनो और दुसरों का हक देने वाले बनो।कुलमिलाकर,गिरिडीह में भी मुहर्रम पर कर्बला के रणबाकुरों को नमन किया गया और खूब अदबो एहतराम के साथ नवसाए रसुल अपनी शहादत पर याद किये गए।

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