कावेरी जल विवाद: कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच पानी की जंग का पूरा इतिहास, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से 2026 के ताजा संकट तक
सिटी स्टार न्यूज | विशेष रिपोर्ट
दक्षिण भारत में कावेरी नदी सिर्फ पानी का स्रोत नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका, खेती, पेयजल और क्षेत्रीय राजनीति से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है। कावेरी जल बंटवारे को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच विवाद एक सदी से भी अधिक पुराना है। समय-समय पर यह विवाद बातचीत, न्यायालय, आंदोलन, राजनीतिक टकराव और सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन तक पहुंचता रहा है।
अगस्त 2026 में एक बार फिर कावेरी विवाद ने जोर पकड़ लिया है। कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) ने कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए 15 दिनों तक प्रतिदिन 12,000 क्यूसेक पानी छोड़ने का निर्देश दिया है। कर्नाटक ने इस मात्रा को अपनी मौजूदा जल-स्थिति और घरेलू जरूरतों को देखते हुए बहुत अधिक बताया है और सुप्रीम कोर्ट का रुख करने पर विचार किया है।
13 अगस्त 2026 को इस मुद्दे के विरोध में कर्नाटक में बंद का आह्वान भी किया गया। हालांकि राज्य के विभिन्न संगठनों में बंद को लेकर एकमत नहीं रहा और बेंगलुरु तथा मैसूर जैसे बड़े शहरों में जनजीवन पर असर सीमित रहने की खबर सामने आई।
आखिर क्या है कावेरी जल विवाद?
कावेरी नदी का उद्गम कर्नाटक के पश्चिमी घाट क्षेत्र में होता है और यह आगे तमिलनाडु से होते हुए बंगाल की खाड़ी में मिलती है। नदी का बेसिन कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी से जुड़ा है।
विवाद का मूल प्रश्न यह है कि नदी के उपलब्ध पानी में अलग-अलग राज्यों का हिस्सा कितना होना चाहिए और विशेष रूप से कम बारिश वाले वर्षों में पानी किस अनुपात में छोड़ा जाए।
कर्नाटक का तर्क रहा है कि वह कावेरी बेसिन का ऊपरी राज्य है और उसके अपने किसानों तथा बेंगलुरु सहित कई क्षेत्रों की पेयजल जरूरतें भी कावेरी पर निर्भर हैं।
वहीं तमिलनाडु का कहना है कि उसके डेल्टा क्षेत्र की कृषि लंबे समय से कावेरी के पानी पर निर्भर है और ऊपर की ओर बांधों तथा जलाशयों में पानी रोकने से उसके किसानों को गंभीर नुकसान हो सकता है।
यही मूल अंतर आज भी विवाद का केंद्र है।
विवाद की ऐतिहासिक शुरुआत कहां से हुई?
कावेरी विवाद की जड़ें ब्रिटिश शासनकाल तक जाती हैं।
1892 में तत्कालीन मैसूर रियासत और मद्रास प्रेसिडेंसी के बीच कावेरी सहित नदियों के पानी के उपयोग को लेकर समझौता हुआ।
इसके बाद **1924 में एक महत्वपूर्ण समझौता** हुआ। उस समय मैसूर और मद्रास के बीच पानी के इस्तेमाल तथा सिंचाई परियोजनाओं को लेकर व्यवस्थाएं तय की गईं।
बाद में जब राज्यों का पुनर्गठन हुआ और भारत स्वतंत्र हुआ, तो नदी बेसिन से जुड़े क्षेत्रों का प्रशासनिक स्वरूप बदल गया। इससे पुराने समझौतों की व्याख्या और उनके प्रभाव को लेकर विवाद बढ़ता गया।
कर्नाटक की ओर से यह तर्क सामने आया कि पुराने समझौते तत्कालीन परिस्थितियों में हुए थे और स्वतंत्र भारत की नई परिस्थितियों में पानी का न्यायसंगत पुनर्वितरण होना चाहिए।
दूसरी ओर तमिलनाडु ने लंबे समय से विकसित सिंचाई व्यवस्था और कावेरी पर निर्भर कृषि को आधार बनाकर अपने हिस्से की सुरक्षा की मांग की।
1970 के दशक से विवाद ने पकड़ा जोर
स्वतंत्रता के बाद दोनों राज्यों के बीच बातचीत के कई दौर हुए। केंद्र सरकार ने भी समाधान निकालने का प्रयास किया, लेकिन स्थायी समझौता नहीं हो सका।
1980 के दशक में विवाद और गंभीर हो गया।
तमिलनाडु ने आरोप लगाया कि कर्नाटक में नई सिंचाई परियोजनाओं और जलाशयों के विस्तार से तमिलनाडु में आने वाले पानी की मात्रा प्रभावित हो रही है।
सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले में दर्ज इतिहास के अनुसार, तमिलनाडु ने 1986 में केंद्र सरकार के समक्ष शिकायत दर्ज कराते हुए कर्नाटक की कई परियोजनाओं का उल्लेख किया था। शिकायत में यह भी कहा गया था कि दोनों राज्यों के बीच द्विपक्षीय बातचीत और केंद्र के स्तर पर किए गए प्रयासों से विवाद का समाधान नहीं हो पाया।
1990: कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन
जब बातचीत से समाधान नहीं निकला तो मामला न्यायिक प्रक्रिया में पहुंचा।
भारत के सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने 1990 में केंद्र सरकार को कावेरी जल विवाद पर एक न्यायाधिकरण गठित करने का निर्देश दिया।
इसके बाद 2 जून 1990 को कावेरी वाटर डिस्प्यूट्स ट्रिब्यूनल (CWDT) का गठन किया गया।
इसमें कर्नाटक और तमिलनाडु के अलावा केरल तथा पुडुचेरी भी पक्षकार थे।
1991 का अंतरिम आदेश
25 जून 1991 को न्यायाधिकरण ने अंतरिम आदेश जारी किया।
इसमें कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए सालाना **205 टीएमसी फीट** पानी उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई थी।
कर्नाटक ने इस आदेश का विरोध किया। राज्य में बड़े पैमाने पर आंदोलन हुए और कावेरी मुद्दा बेहद भावनात्मक राजनीतिक विषय बन गया।
बाद में सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक द्वारा अंतरिम आदेश को निष्प्रभावी करने के प्रयास को स्वीकार नहीं किया और आदेश को लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
कावेरी विवाद के इतिहास में 1991 का दौर बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसके बाद पानी का मुद्दा केवल प्रशासनिक विवाद नहीं रहा, बल्कि दोनों राज्यों की राजनीति और जनभावनाओं से गहराई से जुड़ गया।
1995: कम बारिश ने बढ़ाया संकट
1995 में कमजोर मानसून के कारण कर्नाटक में जल संकट की स्थिति बनी।
कर्नाटक के जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं था और तमिलनाडु को निर्धारित पानी छोड़ने को लेकर तनाव बढ़ गया।
तमिलनाडु ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
इसके बाद प्रधानमंत्री स्तर पर दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच बातचीत हुई और तत्काल समाधान निकालने की कोशिश की गई।
यह घटना बताती है कि कावेरी विवाद में सबसे बड़ी समस्या सिर्फ सामान्य वर्षों में पानी का बंटवारा नहीं है, बल्कि सूखे या कम बारिश वाले वर्षों में पानी के बंटवारे का सवाल भी है।
2007: कावेरी ट्रिब्यूनल का अंतिम फैसला
लगभग 17 वर्षों की सुनवाई और अध्ययन के बाद कावेरी वाटर डिस्प्यूट्स ट्रिब्यूनल ने **5 फरवरी 2007** को अपना अंतिम फैसला सुनाया।
ट्रिब्यूनल के आवंटन के अनुसार:
तमिलनाडु — 419 टीएमसी फीट
कर्नाटक — 270 टीएमसी फीट
केरल — 30 टीएमसी फीट
पुडुचेरी — 7 टीएमसी फीट
ट्रिब्यूनल ने पानी के उपयोग और कर्नाटक से तमिलनाडु की ओर पानी छोड़ने की व्यवस्था से जुड़े प्रावधान भी तय किए।
लेकिन विवाद यहीं समाप्त नहीं हुआ। सभी पक्षों ने ट्रिब्यूनल के फैसले को अलग-अलग आधार पर चुनौती दी और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले में इस पूरे घटनाक्रम का विस्तृत उल्लेख है।
2013: केंद्र ने ट्रिब्यूनल का फैसला अधिसूचित किया
ट्रिब्यूनल के अंतिम फैसले को केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किए जाने में भी समय लगा।
सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, 4 फरवरी 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को ट्रिब्यूनल के फैसले को अधिसूचित करने का निर्देश दिया।
इसके बाद केंद्र सरकार ने 19 फरवरी 2013 को ट्रिब्यूनल के 5 फरवरी 2007 के फैसले को अधिसूचित किया।
2018: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
कावेरी विवाद में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ 16 फरवरी 2018 को आया।
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए।
अदालत ने कर्नाटक के हिस्से में 14.75 टीएमसी फीट की वृद्धि की और तमिलनाडु के आवंटन को उसी अनुपात में कम किया।
इसके बाद कुल वार्षिक आवंटन इस प्रकार हुआ:
कर्नाटक — 284.75 टीएमसी फीट
तमिलनाडु — 404.25 टीएमसी फीटल — 30 टीएमसी फीट
पुडुचेरी — 7 टीएमसी फीट
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कावेरी जैसी अंतरराज्यीय नदी के पानी पर किसी एक राज्य का पूर्ण स्वामित्व नहीं माना जा सकता और नदी के पानी का बंटवारा संबंधित राज्यों की आवश्यकताओं तथा न्यायसंगत सिद्धांतों के आधार पर किया जाना चाहिए।
कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण क्यों बनाया गया?
सिर्फ फैसला सुनाना पर्याप्त नहीं था। सवाल था कि फैसले को जमीन पर लागू कौन करेगा?
इसीलिए Cauvery Water Management Authority (CWMA) और Cauvery Water Regulation Committee (CWRC) जैसी संस्थागत व्यवस्थाएं बनाई गईं।
सुप्रीम कोर्ट के मई 2018 के आदेश में कावेरी जल प्रबंधन योजना के तहत इस व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।
इन संस्थाओं का मुख्य उद्देश्य यह देखना है कि न्यायिक निर्णय और निर्धारित जल-वितरण व्यवस्था का पालन हो तथा जलाशयों और नदी में उपलब्ध पानी की स्थिति को ध्यान में रखते हुए आवश्यक निर्णय लिए जा सकें।
2026 में फिर क्यों भड़का विवाद?
कावेरी विवाद की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि नदी में उपलब्ध पानी हर वर्ष समान नहीं होता।
अच्छी बारिश के वर्ष में दोनों राज्यों के बीच तनाव अपेक्षाकृत कम हो सकता है।
लेकिन जब बारिश कम होती है, जलाशयों में पानी घटता है और किसानों की सिंचाई तथा शहरों की पेयजल जरूरतें बढ़ती हैं, तब पानी छोड़ने को लेकर विवाद तेज हो जाता है।
2026 में भी यही संवेदनशील स्थिति सामने आई है।
कावेरी जल विनियमन समिति ने कर्नाटक को 15 दिनों तक प्रतिदिन 12,000 क्यूसेक पानी तमिलनाडु के लिए छोड़ने का निर्देश दिया। कर्नाटक सरकार ने इस मात्रा को अधिक बताते हुए अपनी जल-स्थिति और राज्य की आवश्यकताओं का हवाला दिया है।
तमिलनाडु ने दूसरी ओर कर्नाटक पर निर्धारित मात्रा में पानी नहीं छोड़ने का आरोप लगाते हुए अगस्त 2026 में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
इस घटनाक्रम ने पुराने विवाद को एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया है।
कर्नाटक का पक्ष क्या है?
कर्नाटक की मुख्य चिंता यह है कि राज्य को अपने जलाशयों में उपलब्ध सीमित पानी को कई जरूरतों के बीच बांटना पड़ता है।
इसमें शामिल हैं:
बेंगलुरु सहित शहरों की पेयजल जरूरत
कर्नाटक के किसानों की सिंचाई
कावेरी बेसिन के स्थानीय जल संसाधन
औद्योगिक और अन्य आवश्यकताएं
कम बारिश वाले मौसम में जलाशयों की सुरक्षा
कर्नाटक का तर्क है कि यदि जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं है तो निर्धारित मात्रा में पानी छोड़ने से राज्य के अपने किसानों और नागरिकों पर गंभीर असर पड़ सकता है।
हालिया घटनाक्रम में कर्नाटक सरकार ने 12,000 क्यूसेक प्रतिदिन की मांग को लेकर आपत्ति जताई है और सुप्रीम कोर्ट से राहत लेने की संभावना पर विचार किया है।
तमिलनाडु का पक्ष क्या है?
तमिलनाडु का बड़ा हिस्सा कावेरी के निचले प्रवाह पर निर्भर है।
राज्य का कावेरी डेल्टा क्षेत्र कृषि के लिए महत्वपूर्ण है और विशेष रूप से धान की खेती में नदी का पानी बड़ी भूमिका निभाता है।
तमिलनाडु का तर्क है कि कर्नाटक द्वारा ऊपर की ओर पानी रोकने या निर्धारित मात्रा में पानी नहीं छोड़ने से उसके किसानों को नुकसान होता है।
इसी आधार पर तमिलनाडु समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट और संबंधित कावेरी प्राधिकरणों के समक्ष अपनी मांग रखता रहा है।
अगस्त 2026 में तमिलनाडु ने कर्नाटक पर पानी की कमी का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।
कावेरी विवाद का सबसे सीधा असर किसानों पर पड़ता है।
अगर कर्नाटक में पर्याप्त बारिश नहीं होती तो वहां के किसान सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी को लेकर चिंतित होते हैं।
दूसरी तरफ यदि तमिलनाडु को समय पर पर्याप्त पानी नहीं मिलता तो कावेरी डेल्टा के किसानों की फसल प्रभावित हो सकती है।
यानी दोनों राज्यों के किसानों की चिंता वास्तविक है।
यही वजह है कि कावेरी विवाद में कोई भी सरकार पानी के मुद्दे पर अपने राज्य की जनता के सामने कमजोर दिखाई नहीं देना चाहती।
बेंगलुरु का पेयजल भी क्यों जुड़ा है?
कावेरी विवाद केवल किसानों का मामला नहीं है।
बेंगलुरु जैसे बड़े शहर की पेयजल व्यवस्था भी कावेरी नदी से जुड़ी है।
इसलिए जब कावेरी बेसिन में पानी की कमी होती है तो राज्य सरकार के सामने एक कठिन संतुलन खड़ा होता है—
क्या पानी सिंचाई के लिए छोड़ा जाए या शहरों की पेयजल जरूरत को प्राथमिकता दी जाए?
इसी वजह से कावेरी का मुद्दा ग्रामीण और शहरी दोनों आबादी के लिए महत्वपूर्ण बन जाता है।
मेकेदाटु परियोजना भी विवाद का हिस्सा
कावेरी विवाद में मेकेदाटु परियोजना एक अन्य बड़ा मुद्दा है।
कर्नाटक कावेरी नदी पर मेकेदाटु में जलाशय बनाने की योजना की वकालत करता रहा है। राज्य का कहना है कि इससे पेयजल जरूरतों और जल प्रबंधन में मदद मिल सकती है।
तमिलनाडु इस परियोजना का विरोध करता रहा है और उसका तर्क है कि परियोजना का असर कावेरी के नीचे की ओर पानी के प्रवाह पर पड़ सकता है।
अगस्त 2026 में मेकेदाटु के मुद्दे को लेकर कर्नाटक में विरोध-प्रदर्शन भी हुए और कर्नाटक-तमिलनाडु मार्ग पर कुछ समय के लिए बस सेवाएं प्रभावित होने की खबर आई।
हालांकि अगस्त 2026 में केंद्र सरकार ने संसद में यह स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के अंतिम कावेरी फैसले में कर्नाटक को कावेरी पर किसी नई परियोजना के निर्माण के लिए तमिलनाडु की सहमति लेना अनिवार्य बताया नहीं गया है। ([The Times of India][8])
क्या कावेरी विवाद का स्थायी समाधान संभव है?
विशेषज्ञों के नजरिए से विवाद का स्थायी समाधान केवल अदालत के आदेश से संभव नहीं होगा।
इसके लिए कई स्तरों पर काम करना पड़ेगा:
1. पानी की वास्तविक उपलब्धता का वैज्ञानिक आकलन
हर वर्ष मानसून और जलाशयों की स्थिति अलग होती है। इसलिए जल-वितरण में वास्तविक समय के आंकड़ों की भूमिका बढ़ानी होगी।
2. जल संरक्षण
दोनों राज्यों को वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और आधुनिक सिंचाई तकनीक पर अधिक जोर देना होगा।
3. फसल पैटर्न में बदलाव
अधिक पानी लेने वाली फसलों की जगह स्थानीय जल उपलब्धता के अनुसार फसल पैटर्न पर विचार करना लंबे समय में मदद कर सकता है।
4. पारदर्शी डेटा साझा करना
जलाशयों का जलस्तर, नदी में प्रवाह, बारिश और पानी की मांग से जुड़े आंकड़े दोनों राज्यों के बीच पारदर्शी तरीके से साझा किए जाने चाहिए।
5. राजनीतिक बयानबाजी से बचना
कावेरी का मुद्दा दोनों राज्यों में भावनात्मक है। राजनीतिक दबाव बढ़ने पर समाधान कठिन हो जाता है।
6. संस्थाओं को मजबूत करना
CWMA और CWRC जैसी संस्थाओं के निर्णयों के प्रभावी अनुपालन तथा वैज्ञानिक निगरानी की व्यवस्था मजबूत करना महत्वपूर्ण होगा।
कावेरी विवाद सिर्फ पानी का विवाद नहीं
कावेरी जल विवाद को केवल “कर्नाटक बनाम तमिलनाडु” के रूप में देखना अधूरा होगा।
यह विवाद कई सवालों का मिश्रण है—
पानी किसका है?
ऊपरी राज्य और निचले राज्य के अधिकारों का संतुलन कैसे हो?
सूखे साल में पानी कैसे बांटा जाए?
किसानों और शहरों की जरूरतों में प्राथमिकता किसे मिले?
पुराने समझौतों को आधुनिक परिस्थितियों में कैसे लागू किया जाए]
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या अंतरराज्यीय नदियों का प्रबंधन राज्यों की सीमाओं से ऊपर उठकर किया जा सकता है? 2026 की स्थिति: फिर आमने-सामने कर्नाटक और तमिलनाडु,
अगस्त 2026 में कावेरी विवाद एक बार फिर अपने पुराने स्वरूप में दिखाई दे रहा है। एक तरफ तमिलनाडु निर्धारित पानी की मांग कर रहा है और दूसरी तरफ कर्नाटक अपनी जल उपलब्धता तथा राज्य की जरूरतों का हवाला दे रहा है।
CWRC के 12,000 क्यूसेक प्रतिदिन पानी छोड़ने के निर्देश ने विवाद को और तेज कर दिया है।
कर्नाटक सरकार सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का इंतजार करने की बात कह रही है, जबकि तमिलनाडु ने पहले ही अदालत का दरवाजा खटखटाया है।
इस बीच कर्नाटक में विरोध-प्रदर्शन और बंद की राजनीति भी शुरू हो गई है। 13 अगस्त को बंद का आह्वान इसी बढ़ते तनाव का हिस्सा रहा।
निष्कर्ष
कावेरी विवाद भारत के सबसे लंबे समय से चले आ रहे अंतरराज्यीय जल विवादों में से एक है। 1892 और 1924 के औपनिवेशिक दौर के समझौतों से शुरू हुआ यह विवाद 1990 के ट्रिब्यूनल, 2007 के अंतिम पुरस्कार, 2013 की अधिसूचना और 2018 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले तक पहुंचा।
इसके बावजूद विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
क्योंकि असली चुनौती कागज पर पानी बांटने से ज्यादा हर वर्ष बदलती बारिश, जलाशयों की स्थिति, किसानों की जरूरत, शहरों की पेयजल मांग और राज्यों की राजनीतिक संवेदनशीलता को संतुलित करना है।
2026 में एक बार फिर कावेरी का पानी दक्षिण भारत की राजनीति के केंद्र में है। आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट और कावेरी से संबंधित प्राधिकरणों के निर्णय यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि मौजूदा जल संकट को किस तरह संभाला जाता है।
कावेरी विवाद का स्थायी समाधान तभी संभव होगा जब कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों पानी को राजनीतिक टकराव के बजाय साझा प्राकृतिक संसाधन के रूप में देखते हुए वैज्ञानिक आंकड़ों, न्यायिक आदेशों और आपसी संवाद के आधार पर आगे बढ़ें।
सिटी स्टार न्यूज के लिए विशेष रिपोर्ट
स्रोत: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के फैसले एवं आदेश, कावेरी जल विवाद से संबंधित आधिकारिक न्यायिक रिकॉर्ड तथा अगस्त 2026 की ताजा रिपोर्टें।
[1]: https://timesofindia.indiatimes.com/city/bengaluru/cauvery-water-row-cwrc-orders-karnataka-to-release-12000-cusecs-daily-to-tamil-nadu-for-15-days/articleshow/133151558.cms?utm_source=chatgpt.com “Cauvery water row: CWRC orders Karnataka to release 12,000 cusecs daily to Tamil Nadu for 15 days”
[2]: https://m.economictimes.com/news/india/cauvery-water-war-karnataka-bandh-brings-a-long-running-feud-to-the-fore-again/articleshow/133199537.cms?utm_source=chatgpt.com “Cauvery water war: Karnataka bandh brings a long-running feud to the fore again”
[3]: https://api.sci.gov.in/supremecourt/2007/11993/11993_2007_Judgement_16-Feb-2018.pdf?utm_source=chatgpt.com “REPORTABLE”
[4]: https://api.sci.gov.in/supremecourt/2018/12008/12008_2018_Judgement_18-May-2018.pdf?utm_source=chatgpt.com “1
REPORTABLE
IN THE SUPREME COURT OF INDIA
CI”
[5]: https://timesofindia.indiatimes.com/india/tamil-nadu-moves-sc-over-cauvery-water-dispute-alleges-shortfall-by-karnataka/articleshow/132827016.cms?utm_source=chatgpt.com “Tamil Nadu moves SC over Cauvery water dispute, alleges shortfall by Karnataka”
[6]: https://timesofindia.indiatimes.com/city/bengaluru/karnataka-says-12000-cusec-cauvery-release-to-tamil-nadu-too-high-weighs-supreme-court-move/articleshow/133177785.cms?utm_source=chatgpt.com “Karnataka says 12,000-cusec Cauvery release to Tamil Nadu ‘too high’, weighs Supreme Court move”
[7]: https://timesofindia.indiatimes.com/city/chennai/mekedatu-dam-issue-bus-services-affected-as-karnataka-outfits-hold-protest-against-tn-at-attibele-check-post/articleshow/133100151.cms?utm_source=chatgpt.com “Mekedatu dam issue: Bus services affected as Karnataka outfits hold protest against TN at Attibele check-post”
[8]: https://timesofindia.indiatimes.com/city/chennai/mekedatu-issue-sc-order-hasnt-mentioned-that-karnataka-should-get-tamil-nadus-consent-for-any-new-construction-across-cauvery-centre-tells-parliament/articleshow/132664622.cms?utm_source=chatgpt.com “Mekedatu issue: SC order hasn’t mentioned that Karnataka should get Tamil Nadu’s consent for any new construction across Cauvery, Centre tells Parliament”
[9]: https://m.economictimes.com/news/india/karnataka-to-wait-for-supreme-court-hearing-before-deciding-on-cauvery-water-release/articleshow/133192268.cms?utm_source=chatgpt.com “Karnataka to wait for Supreme Court hearing before deciding on Cauvery water release”
