इंटरनेशनल टाइगर डे के मौके पर वडोदरा सर्कल और वडोदरा वाइल्डलाइफ सर्कल ने मिलकर एक सफल प्रोग्राम किया,

इंटरनेशनल टाइगर डे पर वडोदरा सर्कल और वडोदरा वाइल्डलाइफ सर्कल का विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम, जंबुघोड़ा-रतनमहल प्रस्तावित कॉरिडोर में संरक्षण पर दिया गया जोर

रिपोर्ट: प्रणव पटेल, गुजरात

वडोदरा। इंटरनेशनल टाइगर डे के अवसर पर सेंट्रल गुजरात के टाइगर रेंज क्षेत्र में कार्यरत फ्रंटलाइन वन कर्मचारियों की क्षमता बढ़ाने और उन्हें बाघ संरक्षण की आधुनिक तकनीकों से अवगत कराने के उद्देश्य से वडोदरा सर्कल एवं वडोदरा वाइल्डलाइफ सर्कल द्वारा संयुक्त रूप से एक विशेष सेंसिटाइजेशन एवं कैपेसिटी बिल्डिंग कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य बीट गार्ड, फॉरेस्टर तथा रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर (RFO) सहित फ्रंटलाइन स्टाफ को बाघों के व्यवहार, प्राकृतिक आवास (हैबिटैट) के संरक्षण, शाकाहारी वन्यजीवों (प्रे-बेस) की उपलब्धता तथा मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के प्रभावी उपायों की जानकारी देना था।

कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने बताया कि गुजरात के कई वन क्षेत्रों में कार्यरत वन कर्मचारियों को तेंदुओं के साथ काम करने का व्यापक अनुभव है, लेकिन बाघों का व्यवहार, उनकी गतिविधियां और पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी भूमिका तेंदुओं से काफी अलग होती है। इसलिए कर्मचारियों को बाघों की गतिविधियों, उनके मूवमेंट पैटर्न, शिकार की आदतों और उनके संरक्षण से जुड़े वैज्ञानिक पहलुओं की विस्तृत जानकारी दी गई, ताकि भविष्य में यदि इस क्षेत्र में बाघों की आवाजाही बढ़ती है तो वन विभाग पूरी तरह तैयार रहे।

कार्यक्रम की मुख्य आकर्षण वक्ता महाराजा सयाजीराव (एम.एस.) यूनिवर्सिटी की सेवानिवृत्त प्रोफेसर एवं प्रसिद्ध प्राणी वैज्ञानिक डॉ. गीता एस. पाठे रहीं। उन्होंने जंबुघोड़ा और रतनमहल वन्यजीव अभयारण्यों में अपने वर्षों के शोध अनुभव साझा करते हुए जंबुघोड़ा-रतनमहल प्रस्तावित वाइल्डलाइफ कॉरिडोर के पारिस्थितिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि वन्यजीव कॉरिडोर विभिन्न जंगलों को आपस में जोड़ने का कार्य करते हैं, जिससे बाघ, तेंदुआ और अन्य वन्यजीव सुरक्षित रूप से एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक आवाजाही कर सकते हैं। इससे जैव विविधता का संरक्षण होता है और वन्यजीवों के लिए बेहतर प्राकृतिक आवास उपलब्ध रहता है।

यह कार्यक्रम श्रीमती निशा राज, आईएफएस, कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स, वडोदरा वाइल्डलाइफ सर्कल तथा महेंद्रसिंह राठवा, आईएफएस, डिप्टी कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स के मार्गदर्शन एवं अध्यक्षता में आयोजित किया गया। इस दौरान वरिष्ठ अधिकारियों ने गुजरात में समय-समय पर बाघों की मौजूदगी और उनके देखे जाने से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि भविष्य में यदि बाघों की संख्या और आवाजाही बढ़ती है, तो प्रशिक्षित फ्रंटलाइन स्टाफ उनकी सुरक्षा और संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

कार्यक्रम में विभिन्न वन प्रभागों के अधिकारी भी उपस्थित रहे। इनमें डिप्टी कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स प्रियंका गहलोत (गोधरा), शकीरा बेगम (महिसागर), अभय कुमार (नर्मदा), मितेश पटेल (बारिया) तथा रूपक सोलंकी (छोटा उदयपुर) प्रमुख रूप से शामिल थे। सभी अधिकारियों ने अपने-अपने क्षेत्रों के अनुभव साझा करते हुए वन्यजीव संरक्षण के लिए आपसी समन्वय और टीमवर्क को आवश्यक बताया।

प्रशिक्षण के दौरान फ्रंटलाइन कर्मचारियों को कई महत्वपूर्ण विषयों पर व्यावहारिक जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने बाघ और तेंदुए के व्यवहार में अंतर, दोनों प्रजातियों की आवासीय आवश्यकताओं तथा उनके संरक्षण की रणनीतियों को विस्तार से समझाया। इसके अलावा बाघों के लिए पर्याप्त शिकार उपलब्ध होना क्यों आवश्यक है, इस पर भी विशेष चर्चा की गई। बताया गया कि चीतल, सांभर, नीलगाय और अन्य शाकाहारी वन्यजीवों की स्वस्थ आबादी ही बाघों के दीर्घकालीन संरक्षण का आधार है। इसलिए प्रे-बेस मैनेजमेंट को संरक्षण रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने पर भी विशेष जोर दिया गया। अधिकारियों ने कहा कि जंगलों से लगे गांवों में रहने वाले लोगों को वन्यजीवों के प्रति जागरूक बनाना, सुरक्षित व्यवहार अपनाने के लिए प्रेरित करना तथा वाइल्डलाइफ कॉरिडोर की सुरक्षा में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना समय की आवश्यकता है। स्थानीय समुदायों का सहयोग मिलने से वन्यजीव संरक्षण के प्रयास अधिक प्रभावी बन सकते हैं।

कार्यक्रम की शुरुआत आमंत्रित अतिथियों के स्वागत के साथ हुई। समापन अवसर पर उपस्थित सभी वन अधिकारियों और कर्मचारियों ने बाघों, शाकाहारी वन्यजीवों तथा उनके प्राकृतिक आवास के संरक्षण के लिए पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ कार्य करने का संकल्प लिया। अधिकारियों ने विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम भविष्य में गुजरात के प्रस्तावित टाइगर कॉरिडोर क्षेत्रों में वन्यजीव संरक्षण को और अधिक मजबूत बनाने के साथ-साथ फ्रंटलाइन स्टाफ की कार्यक्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

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