देश की जानी-मानी हस्तियां क्या कह रही हैं?सीजेपी के आंदोलन पर,
प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का आंदोलन अब केवल दिल्ली के जंतर-मंतर तक ही सीमित नहीं दिख रहा है.
20 जुलाई को ‘चलो संसद’ मार्च में जो भीड़ जुटी थी, वो अब भी छँटी नहीं है. देश के कई हिस्सों में विरोध-प्रदर्शन हो रहा है. सीजेपी की मांग है कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफ़ा दें. हालांकि मोदी सरकार की तरफ़ से अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है. दूसरी तरफ़ सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल 26वें दिन पहुँच गई है.
वांगचुक ने केंद्रीय मंत्रियों जे. पी. नड्डा और जितेंद्र सिंह को संबोधित करते हुए एक पत्र जारी किया है. दोनों मंत्री मंगलवार रात गुरुग्राम के मेदांता हॉस्पिटल में उनसे मिलने पहुँचे थे.
पत्र में वांगचुक ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े पर ज़ोर दिए बिना कहा कि मंत्रियों ने उन्हें आश्वासन दिया है कि सरकार “प्रश्नपत्र लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को उचित मुआवजा देने” और धर्मेंद्र प्रधान की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए, जिसमें उनके इस्तीफ़े पर विचार भी शामिल हो, संसद में सार्थक चर्चा कराने पर विचार करेगी.
पत्र जारी होने के कुछ ही देर बाद सीजेपी ने कहा कि जब तक सरकार उसकी मांगें नहीं मान लेती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा. सीजेपी ने एक बार फिर धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग दोहराई, जबकि उसकी अन्य शर्तें वांगचुक की मांगों से काफ़ी हद तक मिलती-जुलती थीं.
छात्रों के इस आंदोलन पर भारत की कई हस्तियां अब खुलकर बोल रही हैं. अरुंधति रॉय जानी-मानी लेखिका हैं. वह बुकर विजेता भी हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वह आलोचक भी रही हैं. अरुंधति रॉय ने दा वायर में एक लेख के ज़रिए इस आंदोलन का समर्थन किया है.
अरुंधति रॉय (जानी-मानी लेखिका और एक्टिविस्ट)

कई वर्षों बाद पहली बार भारतीय होने पर गर्व और उम्मीद दोनों महसूस हो रहे हैं. ठीक उस समय, जब लगने लगा था कि सारी उम्मीदें ख़त्म हो चुकी हैं. बारिश के बीच आगे बढ़ते युवा कॉकरोच. एक जज और एक तंज़ भरे मज़ाक के अस्वाभाविक गठजोड़ की उपज.
विपक्षी दलों के अनुसार, 2014 से अब तक ऐसे लगभग 152 पेपर लीक हो चुके हैं. इन घटनाओं ने उन लाखों युवाओं का भविष्य बर्बाद कर दिया, जिन्होंने इन परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों लगाए. कई अभिभावकों ने अपने बच्चों की पढ़ाई और परीक्षा शुल्क जुटाने के लिए अपनी ज़मीन या घर तक बेच दिए. इसे एक नए तरह की वैध उगाही बताया गया है.
अन्ना हज़ारे आंदोलन के उलट, जिसे हफ़्तों तक सैकड़ों उन्मादी कॉर्पोरेट स्वामित्व वाले टीवी चैनलों ने चौबीसों घंटे लगातार कवरेज दी थी, कॉकरोच जनता पार्टी के पास भरोसा करने के लिए सिर्फ़ वह ख़ुद है और इंटरनेट है.
अन्ना आंदोलन के उलट, जिसमें आरएसएस ने धीरे-धीरे प्रभाव बना लिया था और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी चुनावी लाभ उठाने के लिए पूरी तैयारी के साथ इंतज़ार कर रही थी, कॉकरोच जनता पार्टी के पीछे ऐसा कोई संगठित विपक्षी दल खड़ा नहीं है जो इस आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए तैयार बैठा हो.
जो स्वतः स्फूर्त जनाक्रोश आज दिखाई दे रहा है, वह तब तक धीरे-धीरे ख़त्म हो जाएगा जब तक उसे वास्तविक राजनीतिक दिशा और संगठन नहीं मिलता. जब तक बड़े लोग और विपक्षी दल अपनी आपसी होड़ और छोटी-छोटी राजनीतिक लड़ाइयों को छोड़कर एकजुटता नहीं दिखाते.
सरकार यह अच्छी तरह जानती है कि ऐसा होना मुश्किल है. इसलिए वह बेपरवाह बनी हुई है, क्योंकि उसे लगता है कि उसे सिर्फ़ इंतज़ार करना है. स्टेट इंतज़ार कर सकता है, लेकिन जनता नहीं.
क्या कॉकरोचों की यह ऊर्जा हमें इस गहरे गड्ढे से बाहर निकाल सकती है? यह आसान नहीं है. भारत में जन आंदोलनों के इतिहास पर एक नज़र डालें तो तस्वीर बहुत उत्साहजनक नहीं दिखती. यह सिकुड़ती आकांक्षाओं और टूटे हुए सपनों का संक्षिप्त इतिहास है.
साठ और सत्तर के दशक में कई आंदोलनों ने, जिनमें नक्सलियों का सशस्त्र विद्रोह भी शामिल था, संपत्ति के पुनर्वितरण और जोतने वाले किसान को ज़मीन देने की मांग उठाई. इन आंदोलनों को कुचल दिया गया.
80 और 90 के दशक में सामाजिक आंदोलनों ने, जिनमें सबसे प्रमुख नर्मदा बचाओ आंदोलन था और बाद में आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड में माओवादी आंदोलन, किसानों और आदिवासियों को उनकी ज़मीन से बेदखल किए जाने का विरोध किया. वे केवल यह मांग कर रहे थे कि ग़रीबों के पास जो थोड़ा-बहुत है, वह भी उनसे न छीना जाए. इन आंदोलनों को भी कुचल दिया गया.
2000 के दशक तक आते-आते स्थिति यह हो गई कि लोग राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के लिए ही आभारी होने लगे. यानी न्यूनतम मज़दूरी पर साल में तीन महीने के रोज़गार का अधिकार, जिसकी कुल राशि किसी बड़े शहर के महंगे रेस्तरां में एक अच्छे भोजन की क़ीमत के बराबर बैठती है.
सविता झा (दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास की अध्यापक)
सविता झा ने 22 जुलाई को इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखा था. ये उसी का अंश है.
आज अपनी छोटी बेटी से हुई एक बातचीत ने मेरी कई पक्की धारणाओं को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया.
उसने पूछा, “मम्मी, आप जंतर-मंतर क्यों नहीं गईं?” मैंने जवाब दिया कि मौजूदा आंदोलन का नेतृत्व कर रहे लोगों की राजनीति या उनके तरीकों से मैं ज़रूरी नहीं कि सहमत हूँ. वह कुछ निराश लगी. तभी मुझे अहसास हुआ कि हम दोनों बिल्कुल अलग-अलग बात कर रहे थे. मैं आंदोलन की राजनीति के बारे में सोच रही थी, जबकि वह आंदोलन की वजह के बारे में सोच रही थी.
उसके लिए असली सवाल यह नहीं था कि मार्च की अगुवाई कौन कर रहा है. उसके लिए सबसे बड़ा सवाल उन बच्चों का था, जिनकी ज़िंदगी बर्बाद हो गई, जिनमें वे छात्र भी शामिल हैं, जिन्होंने आत्महत्या कर ली, क्योंकि स्टेट एक ऐसी परीक्षा व्यवस्था सुनिश्चित नहीं कर सका जो सुरक्षित, पारदर्शी और जवाबदेह हो. इस बात पर मैं उससे असहमत नहीं हो सकती.
बच्चों में एक अद्भुत क्षमता होती है. वे विचारधाराओं की परतों को हटाकर सबसे सरल, लेकिन सबसे कठिन सवाल पूछ लेते हैं. अगर व्यवस्था ने इन बच्चों को विफल किया है, तो क्या हम सबको इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए? शायद यही वह बातचीत है जो हमें करनी चाहिए. यह नहीं कि प्रदर्शन कौन कर रहा है, बल्कि यह कि आख़िर ऐसे प्रदर्शन की ज़रूरत क्यों पड़ती है. जब लोग विरोध के लिए सड़क पर उतरते हैं, तो क्या हमें उनसे संवाद नहीं करना चाहिए?
मैं वह अभिभावक नहीं बन सकती जिसने नैतिक प्रश्न पूछने पर नचिकेता को घर से निकाल दिया था. कठोपनिषद हमें याद दिलाता है कि सभ्यताएं असहज सवालों को दबाने से आगे नहीं बढ़तीं, बल्कि उनका सामना करने और उन पर संवाद करने से आगे बढ़ती हैं.
आज हम नचिकेता को याद करते हैं और उनका सम्मान करते हैं, उनके पिता को नहीं, क्योंकि उन्होंने आज्ञाकारिता से अधिक सत्य को और भय से अधिक जिज्ञासा को चुना था. ऐसे समय में, जब असहमति को अक्सर देश या व्यवस्था के प्रति निष्ठा की कमी समझ लिया जाता है, नचिकेता का आदर्श हमारी सभ्यता की सबसे बड़ी सुरक्षा में से एक बना रहता है. किसी समाज को अंततः दमन नहीं, बल्कि संवाद ही बचाता है.
शशि थरूर,

शशि थरूर ने अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में 22 जुलाई को एक लेख लिखा था. पढ़िए उसका एक अंश.
संवैधानिक लोकतंत्र की असली कसौटी यह नहीं है कि वह क़ानून का पालन कराने के लिए कितनी शक्ति रखता है, बल्कि यह है कि वह असहमति के साथ कितनी विनम्रता से संवाद करता है.
एक मज़बूत गणतंत्र शांतिपूर्ण विरोध को अपने नागरिकों की चिंताओं का प्रतिबिंब दिखाने वाले आईने की तरह देखता है.
इसके उलट, एक असुरक्षित कार्यपालिका उसी आईने को अपना दुश्मन मानती है, उसे लाठियों से तोड़ देती है और जब उसके टूटे हुए कांच के टुकड़े सत्ता के दरवाज़े के बाहर सड़कों पर गिरकर नागरिकों की नसों को चीरते हैं, तब भी आंखें मूंद लेती है.
जो स्टेट एक निहत्थे प्रदर्शनकारी की नैतिक शक्ति से डरता है, वह अपनी ही कहानी और वैधता पर गहरे अविश्वास का परिचय देता है. आंदोलन को दबाने का तरीक़ा, छात्र नेताओं को निशाना बनाकर गिरफ़्तार करना और प्रदर्शन के आयोजकों को शारीरिक रूप से डराने-धमकाने की कोशिश एक व्यापक राजनीतिक रणनीति की ओर इशारा करती है.
आंदोलन को नेतृत्वविहीन बना दो, उसके विरोध को अपराध की तरह पेश करो और समय के साथ जनता के ग़ुस्से को थका दो.
सड़कों पर जो दृश्य दिखाई दिया, वह शासन की नाकामी का प्रतीक था. वहीं संसद के भीतर जो प्रतिक्रिया देखने को मिली, उसने विधायिका के अपने दायित्वों की एक गहरी संस्थागत विफलता को उजागर किया.
जब सेंट्रल दिल्ली ग़ुस्से, पीड़ा और आंसुओं से भरी हुई थी, तब स्वाभाविक उम्मीद थी कि लोकसभा और राज्यसभा के पवित्र सदनों में इस पर गंभीर और तत्काल चर्चा होगी. विपक्ष ने क़ानून-व्यवस्था की स्थिति, प्रदर्शन कर रहे युवाओं की शिकायतों और कथित अत्यधिक बल प्रयोग पर चर्चा के लिए कार्यवाही स्थगित करने के कई नोटिस दिए.
लेकिन इन सभी नोटिसों को तुरंत ख़ारिज कर दिया गया, प्रक्रियागत अड़चनें खड़ी की गईं और सरकार ने कोई लचीलापन नहीं दिखाया. देश के सामने संदेश बिल्कुल स्पष्ट था, सड़कों पर गूंज रही शिकायतों के लिए संसद के भीतर कोई जगह नहीं है.
जब कार्यपालिका ख़ुद को संसद में होने वाली चर्चा से अलग कर लेती है, तो वह संसदीय लोकतंत्र की उस मूल अवधारणा पर चोट करती है, जिसके तहत कार्यपालिका जनता की संप्रभु इच्छा का प्रतिनिधित्व करने वाली विधायिका के प्रति जवाबदेह होती है.
नसीरुद्दीन शाह (अभिनेता)

मैं आप सबसे दो बातें कहना चाहता हूँ. पहली बात यह कि अगर कोई अज्ञानी व्यक्ति इस देश का नेतृत्व करेगा, तो वह चाहेगा कि पूरा देश भी उसी की तरह अज्ञानी, असंवेदनशील और निर्मम बन जाए.
एनएसडी और एफटीआईआई से अभिनय की शिक्षा पूरी करने के बाद मैंने अभिनय की कला के बारे में सबसे अधिक उन्हीं बच्चों और शिक्षित लोगों से सीखा है, जिन्हें कभी मैंने सिखाने की कोशिश की थी. उनके प्रति मेरी गहरी संवेदनाएं हैं.
इस वक़्त मेरा दिल भी भरा हुआ है और मैं ग़ुस्से से खौल भी रहा हूँ, यह देखकर कि हमारे इन बच्चों के साथ किस तरह ज़ुल्म किया जा रहा है. ये मुझे अमेरिका के आईसीई एजेंट्स की याद दिलाते हैं, मुँह पर नकाब लगाए हुए, हाथ में डंडा लिए हुए. कभी अपने बच्चों के बारे में भी सोचा करो और यह भी सोचो कि तुम्हारा अंजाम तुम्हें भी एक दिन ज़रूर मिलेगा.
इन सब बच्चों से मैं कहना चाहता हूँ कि हिम्मत न हारें. बहुत से लोगों की हमदर्दी आपके साथ है, बहुत से लोग आपके साथ हैं. आप लड़ते रहें. मुझे हमारे मुल्क की युवा पीढ़ी से हमेशा उम्मीद रही है और अब वो उम्मीद और भी उजागर हो गई है.
